शनिवार, 3 मई 2008

जनजातीय बहुल राज्य छत्तीसगढ़ : एक परिचय

घने वनाच्छादित और प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य में जनजातीय संस्कृति का पोषण -संवर्धन और उनकी मूल परिचयात्मक विशेषताओं के साथ उनके विकास कार्यक्रमों के संचालन की अपार संभावनाएं है । छत्तीसगढ़ की एक तिहाई जनसंख्या अनुसूचित जनजातियों की है । यहां प्रदेश की कुल जनसंख्या का 31.76 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों का है । मध्यप्रदेश ,महाराष्ट्र् ,उड़ीसा ,गुजरात , और झारखंड के बाद छत्तीसगढ़ का जनजातियों की जनसंख्या के आधार पर छठे नम्बर पर आता है । जबकि कुल जनसंख्या प्रतिशत के आधार पर छत्तीसगढ़ का मिजोरम,नागालैंड,मेघालय औरअरूणचल प्रदेश के बाद पांचवे स्थान पर है ।

नवगठित छत्तीसगढ़ राज्य की कुल जनसंख्या वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 2,08,33,803 थी, जिसमें अ0ज0जा0की जनसंख्या 66,16,596 है जो कि राज्य की जनसंख्या का 31.76 प्रतिशत है तथा देश की अ0ज0जा0की जनसंख्या का 8.44प्रतिशत है ।अविभाजित पुराने मध्यप्रदेश के लिए भारत सरकार द्वारा अधिसूचना में से ग्यारह जन जातियां भील, भीलमीण,डामोर, कारकू, मवासी,सहरिया, सौर ,सोर,आंध्र और कोलम जो कि छत्तीसगढ़ में नहीं केवल मध्यप्रदेश में निवास करते है ,को अलग करने पर छत्तीसगढ़ राज्य में कुल 31 जनजातीय समूह होगा । ये जनजातियां है :- 1. अगरिया 2.बैगा 3.मैना 4. भूमिया,भूईहर,पालिहा,पांडो 5.भतरा 6.भंुजिया 7. बिआर, बियार 8.बिझवार 9. बिरहुल ,बिरहोर 10. धनवार 11. गदाबा,गदबा 12. गोंड, अगरिया,असूर,बड़ी मारिया,बड़ामारिया,भटोला,बिसोनहान मारिया, छोटा मारिया, दंडामी मारिया,घुरू,दोरला, हिलमारिया,कंडरा, कलंगा, खटोला, कोईतार, कोया, खिरवार हिरवारा , कुचामारिया, कुचाकी मारिया, माडि़या, मुरिया , नगारची, नागवंशी, ओझाा,राज, सोन्झारी,झोका, भाटिया, भोटिया, बड़े माडि़या बडडे माडि़या 13. हल्बा 14. कमार 15. कंवर, कवर, कौर, चेरवा, राठिया, तंवर, छत्री 16. खैरवार, कोंदर 17. खरिया 18. कांेध, खांड, कांध 19. कोल 20. कोरवा, कोड़ाकू 21. मांझी 22. मझवार 23. मुण्डा 24. नगेसिया, नगासिया 25. उरांव, धनका, धनगड़ 26.पाव 27. परधान, पथारी, सरोती, 28. पारधी, बहेलिया, चितापाधी,लंगोली पारधी, फासपारधी, ’िाकारी,ताकनकर, टाकिया 29.परजा 30.सोंटा और 31. संवरा । इन जातियों में से पांच जनजातियों क्रमशः कमार, अबूझमाडि़या, पहाड़ी कोरवा, बिरहारे और बैगा को विशेष पिछड़ी जनजाति के रूप में भरत सरकार द्वारा मान किया गया है । कीर,मीणा,पनिका तथा पारधी क्षेत्रीय बंधन मुक्त जनजाति है ।

छत्तीसगढ़ राज्य के सभी सोलह जिलों में जनजातियों का निवास है, जिसमें क्रमशः दंतेवाड़ा (77.58प्रतिशत) , बस्तर (66.59),कांकेर (57.71), जशपुर (66.59), तथा सरगुजा (55.4), में आधे से अधिक तथा कम संख्या की दृष्टि में क्रमशः दुर्ग (12.43प्रतिशत ), जांजगीर-चांपा (13.25), रायपुर (14.84), बिलासपुर (19.55), जिला है । जबकि कोरिया में 47.28 ,कोरबा में 42.43, रायगढ़ में 36.85, राजनांदगांव में 26.54, धमतरी में 26.44 और कवर्धा में 21.04 प्रतिशत जनजाति रहतें है ।

छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातिया : सार बिन्दुओं में
(अ) जनांकीय

-ः देश के कुल अनुसूचित जनजातियों का 8.44 प्रतिशत जनसंख्या छत्तीसगढ़ में निवासरत है ।

-ः जनजातियों की कुल जनसंख्या की दृष्टि से छत्तीसगढ़ का स्थान मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र् , उड़ीसा,गुजरात,झारखंड के बाद छठे स्थान पर है ।

-ः देश के सभी राज्यों में अ0ज0जा0 जनसंख्या प्रतिशत की दृष्टि से छत्तीसगढ़ का स्थान पांचवा है ।

-ः छत्तीसगढ में निवासकरने वाले पांच जनजातियों क्रमशः कमार, अबूझमाडि़या, पहाड़ी कोरवा, बिरहारे, और बैगा को विशष पिछड़ी जनजाति के रूपमें भारत सरकार द्वारा मान्य किया गया है ।

-ः नवगठित छत्तीसगढ़ राज्य की कुल जनसंख्या वर्ष 2001 के अनुसार 20833803 थी, जिसमें अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या 6616596 है जो कि राज्य की कुल जनसंख्या का 31.76प्रतिशत है ।

-ः अविभाजित मध्यप्रदेश के लिए भारत सरकार द्वारा जारी की गई अनु.जनजातियों की सूची में 42 समूह है , किंतु इनमें से मात्र 31 समूह ही छत्तीसगढ़ में निवास करते है ।

-ः भील, भीलमाीण, डामारे, कारकू, मवासी, सहरिया, सौर, सोंर तथा आंधवकोलम छत्तीसगढ़ में नहीं मध्यप्रदेश में निवास करते है ।

-ः छत्तीसगढ़ के सभी सोलह जिलों में जनजातियों का निवास है, जिसमें जिलेवार जनसंख्या प्रतिशत की दृष्टि से सबसे ज्यादा 77.58 प्रतिशत दंतेवाड़ा (451696) में है ।

-ः जबकि जनजातियों की संख्या की दृष्टि से सबसे ज्यादा सरगुजा में जिले की कुल जनसंख्या का 55.4प्रतिशत है, जहां 1991 की जनसंख्या में कुल अ0ज0जा की संख्या9,05,374 आंकी गई है ।

-ः राज्य में जनसंख्या प्रतिशत की दृष्टि से सबसे कम अ0ज0जा0 दुर्ग जिले में (12.43) है । जहां अ0ज0जा0 की संख्या 298059 गिना गया है ( 1991 जनगणना के अनुसार ) ।

-ः संख्या की दृष्टि से सबसे कम अनु0 जनजाति वाला जिला कवर्घा है जहां कुल 21.04 प्रतिशत आदिवासी 1,00,460 की संख्या में है ।

-ः अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या व प्रतिशत की दृष्टि से सबसे बड़ा संभाग बस्तर संभाग है जहां कुल जनसंख्या का 67.29 प्रति’ात अनुसूचित जनजाति (1529888) है ।

-ः छत्तीसगढ़ राज्य में अ0ज0जा0 की 1991 की जनसंख्या के अनुसार प्रति 1000 पुरूष के पीछे 1015 स्त्रियां है ।

-ः लिंग अनुपात की दृष् िट से राजनांदगांव मंे प्रति 1000 पुरूष के पीछे महिलाओं की संख्या सर्वाधिक 1047 है । जबकि सबसे कम कोरिया 961 है ।

-ः कोरबा (990) , सरगुजा (979) , तथा कोरिया (961) , के अलावा सभी 13 जिलों में लिंगानुपात में स्त्रियों की संख्या पुरूषों की अपेक्षा ज्यादा है ।

-ः छत्तीसगढ़ में 1991 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जन जातियों की साक्षरता 31.4 प्रतिशत है । जिसमंे पुरूष साक्षरता प्रतिशत 45.49 प्रति’ात तथा 17 प्रतिशत महिलाएं साक्षर है ।

प्रजाति,भाषा एवं उत्पत्ति

-ः छत्तीसगढ़ की सभी जनजातियों में प्राटो-आस्ट््रोला 45 प्रजातीय लक्षण पाये जाते है ।

-ः मुण्डा, कोरवा, मांझी, खरिया, गदबा, बिरहारे, संवारा आदि आस्ट््िरन भाष परिवार की बोली बोलते है ।

-ः द्रविड़ भाषा परिवार की बोली में गोंड़ ( गोंड़ी या कोया ) उरांव ( कुडुख बोली) दोरला तथा परजा आदि बोली आता है ।

-ः मूल बोली व भाषा भूलकर जिन जनजातियों ने क्षेत्रीय बोली छत्तीसगढ़ (अपने भाषा परिवार की बोली ) को अपनाया है वे है ः- कंवर, ंिझवार, भूंजिया, धनवार, मैना, बैगा और हल्बा ।

-ः प्रदेश की जनजातियों की सबसे समृद्ध बोली व भाषा में गोंडा, हल्बा, मुण्डा है । इसमें हल्बी और गोंडी में साहित्य लेखन भी समृद्ध है ।

-ः जनजातीय भाषा हल्बी व गोंडी में प्रवाहित होनेवाला प्रदक्षेवा एक मात्र सप्ताहिक अखबार बस्तिरया’ जगदलपुर से प्रकाशित होता है ।

-ः छत्तीसगढ़ की जनजातियों पर सर्वप्रथम शोध करने वाले समाजशास्त्रियों में वेरियर एलविन का नाम प्रमुख रूप् से लिया जात है । इनकी पुस्तके है -”द बैगा”,द रीलिजन आफ इन इन्डीयन ट््राइव, द मुरियाज एंड देयर घोटूल, द अगरिया, मुरिया मर्डर एंड सुसाईड ।

-ः बस्तर की जनजातियों पर डबलु0 बी0 ग्रिवासन ने भी काफी महत्वपूर्ण ‘ोध ग्रन्थ लिखा । उनकी पुस्तक है - द मुरिया गोंड आफ बस्तर
-ः बस्तर के पूर्व जिलाधीश रह चुके प्रसिद्ध समाजसेवी व जन आंदोलन से जुड़े श्री ब्रम्हदेव शर्मा की पुस्तकंंे आदिवासी विकास- एक सैद्धांतिक विवेचन, और आदिवासी स्वशासन, भी काफी चर्चित है ।

-ः अन्य चर्चित पुस्तकांंे मेंं बस्तर भूषण केदारनाथ ठाकुर, आदिवासियों के बीच ( श्री चंद जैन ) ।

-ः छत्तीसगढ़ की सबसे प्राचीनतम जनजाति बैगा जनजाति को माना जाता है, इतिहासकार समाजशास्त्री एलविन ने इनहे आदिवासी (।इवतप्रपदंसे)कहा है ।

-ः छत्तीसगढ़ में छोटानागपुर क्षेत्र में सर्वप्रथम बैगाओं ने प्रवे’ा किया था, जिन्हे बाद में अंदखनी जंगली इलाकों की ओर धकेल दिया गया ।

-ः आर्थिक दृष्टि से संपन्न आदिवासियों में हल्बा, आंव व कंवर आदि आते है ।

छत्तीसगढ़ के जनजातियों का प्रमुख आभूषण

लुरकी ः यह कानों में पहना जाता है, जो पीतल,चांदी,तांबे धातुओं का बना होता है । इसे कर्ण फूल,खिनवा कहा जाता है ।

करधनः चांदी गिलट या नकली चांदी से बना यह वजनी आभूषण छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी जनजाति की महिलाओं द्वारा कमर में पहना जाने वाला आभूषण है । इसे करधनी कहते है ।

सूतियाः गले में पहनाजाने वाला यह आभूषण ठोस गोलाई में एल्यूमिनिय’म,गिलट,चांदी,,पीतल आदि का होता है ।

पैरीः पैर में पहना जाता है, गिलट यया चांदी का होता है ।इसे पैरपटटी, तोड़ा या सांटी भी कहा जाता है । कहीं-कहीं इसका नाम लच्छा भी है ।

बांहूटा ः- वांह में स्त्री पुरूष दोनो द्वारा पहना जाने वाला यक आभूषण अकसर चांदी या गिलट का होता है ं इसे मैना जनजाति में पहुंची भी कहा जाता है । भुंजिया इसे बनौरिया कहते है ।

बिछियांः- पैर की उंगलियों में पहना जाता है, हगर यह चांदी का होता है । इस का अन्य नाम चुटकी बैगा जनजाति में अपनाया जाता है ।

ऐंठीः- यह कलाई में पहना जाने वाला आभूषण है, जो कि चांदी,गिलट आदि से बनाया जाता है । इसे ककना और गुलेठा भी कहा जाता है ।

बन्धाः- गले में पहना जाने वाला यह सिक्कों का माला होता है, पुराने चांदी के सिक्कों की माला आज भी आदिवासी स्त्रियों की गले की शोभा है ।

फुलीः- यह नाक में पहना जाता है, चांदी,पीतल या सोने का भी होता है, इसे लौंग भी कहा जाता है ।

धमेल ः- गले में पहना जानेवाला यह आभूषण चांदी या पीतल अथवा गिलट का होता है । इसे सरिया व हंसली भी कहा जाता है ं

नागकोरीः- यह कलाई में पहना जाता है मुख्य रूप् से ंिहवार जनजाति इसका प्रयोग करते है ।
खांेचनीः- यह सिर के बालों में लगाया जाता है । बस्तर मुरिया ,माडि़या आदिवासी इस लकड़ी से तैयार करते हैं । अनेक स्ािानों पर चांदी या गिलट का तथा कहीं पत्थर भी प्रयोग किया जाता है । बस्तर में प्लास्टिक कंघी का भी इस्तेमाल इस आभूषण के रूप् में होता है । इसे ककवा कहा जाता है ।

मुंदरी ः- यह हाथ में उंगलीयों पहना जाने वाला धातु निर्मित आभूषण है, बैगा जनजाति की युवतियां इसे चुटकी भी कहती है ।
सुर्डा@सुर्रा- यह गले में पहना जाता है । गिलट या चांदी निर्मित यह आभूषण छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की एक उभ्यनिष्ठ पहचान है ।



छत्तीसगढ़ की जनजातियों में प्रचलित विवाह

पैठुल विवाह ः- अगरिया जनजाति में इसे ढूकू तथा बैगा जनजाति में पैढू कहा जाता है । बस्तर संभाग की जनजातियों में यह ज्यादा लोकप्रिय है । इसमें कन्या अपनी पसंद के लड़के के घर घुस जाती है । जिसे लड़के की स्वीकृति पर परिवार के बिरोहघ के बाद भी सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है । कोरवा जनजाति में भी ढुकु विवाह होता है ।

लमसेना ः- यह सेवा विवाह का रूप है तथा संपूर्ण छत्तीसगढ़ की जनजातियों में इसे सामाजि स्वीकृति प्राप्त है । इस विवाह में विवाह योग्य युवक को कन्या के घर जाकर एक या दो वर्ष कभी इससे ज्यादा समय तक अपनी शारीरिक क्षमता का परिचय देना पड़ता है । अपने भावी ससुराल में परिवार के सदस्य की तरह मेहनत करते हुए उसे कन्या के साथ पति की तरह रहने की स्वतंत्रता रहती है, किंतु विवाह का निणर््ाय संतुष्टि के बाद ही लिया जाता है । बस्तर में इस तरह के विवाह कभी-कभी एक या अधिक बच्चों के जन्म के बाद भी होता है । इस तरह का विवाह पद्धति कंवर,गोंड,भील, मारिया,माडि़या बिंझवार, अगरिया,कोरवा आदि जनजातियों में अपनाया जाता है । कंवर इसे घरजन और बिंझवार घरजिया कहते है ।

गुरांवटः- यह एक प्रचलित विवाह प्द्धति है, जो संपूर्ण छत्तीसगढ़ में गैर जन-जातीय व जन जातीय दोनो समूहों में अपनाया जाता है ।इसमें दो परिवारों के बीच दो विवाह एक साथ संपन्न होते हैं , जिसमें दोनो परिवार की लड़कियां एक-दूसरे के लड़कों के लिए वधु के रूप् में स्वीकार कर लिया जाता है । इसे बिरहारे जनजाति में गोलत विवाह भी कहा जाता है ।

भगेली ः- भगेली विवाह का प्रचलन गोड जनजाति में हैं, यह लड़के और लड़की की मर्जी से होता है । लड़की के मां-बाप के राजी न होने की स्थिति में लड़की अपने घर से भागकर रात्रि में अपने प्रेमी के घर आ जाती है ।जहां छपरी के नीचे आकर खड़ी हो जाती है, और लड़का एक लोटा पानी अपने घर के छपपर पर डालता है । जिसका पानी लड़की अपने सिर पर झेलती है । इसके प’चात लड़के की मां उसे घर के अंदर ले आती है । फिर गांव का मुखिया या प्रधान लड़की को अपनी जिम्मेदारी में ले लेता है और लड़की के घर उसने भगेली होने की सूचना देता है । फिर रात्रि में मड़वा गाढ़कर भांवर कराया जाता है, अकसर लड़की के माता-पिता अन्न और भेंट पाकर राजी हो जाते है ।

चढ़ विवाहः- इस तह के विवाह में दुल्हा बारात लेकर दुल्हन के घर जाता है और विधि-विधान तथा परंपरागत तरीके से विवह रस्म को पूर्ण करता है ।इसके बाद वह दुल्हन को बिदा कराकर अपने साथ ले आता है ं छत्त्ीसगढ़ की प्रायः सभी जनजातियों में यह विवाह का प्रचलित तरीका है ।

पठोनी विवाह ः- इस विवाह में लड़की बारात लेकर लड़के के घर आती है लड़के के घर पर ही मंडप में विवाह संपन्न होता है, तदुपरान्त दुल्हा को विदाकराकर के अपने घर ले आती है । इस तरह का विवाह छत्तीसगढ़ के अत्यन्त अल्प रूप् में गोंड जनजाति में देखने को मिलता है ।

उढ़रियाः- इस विवाह को पलायन विवाह कहना ज्यादा उचित है । इसे उधरिया भी कहा जाता है । इस तरह का विवाह भी प्रायः सभी जनजातियों में होता है । यह प्रेम विवाह है । जिसमें लड़का और लड़की एक दूसरे को पसंद कर लेते है । माता-पिता की अनिच्छा के बाद भी अपने सहेली और मित्रों के साथ किसी मेला-मड़ई या बाजार में मिलते हैं और वहीं से एक साथ हो किसी रि’तेदार के यहां जा पहुंचते हैं । जहां उनके आंगन में डाली गाढ़कर अस्थाई विवाह करादिया जाता है । बाद में पंचों व रि’तेदारों के प्रयास से मां-बाप को राजी कराकर स्थायी विवाह करा लिया जाता है ।

6 टिप्‍पणियां:

आलोक ने कहा…

छत्तीसगढ़ इलाके की इतनी जानकारी आपने कहाँ से एकत्रित की है बधाई।

कमल शुक्ला ने कहा…

आलोक जी धन्यवाद !यह सारांश 'छत्तीसगढ की जनजातीय संस्कृति' पर शीघ्र प्रकाशित पुस्तक का अंश है |

कमल शुक्ला ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
कमल शुक्ला ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
संजीव तिवारी ने कहा…

शुक्‍ला जी, बहुत सुन्‍दर प्रस्‍तुति के लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद ।


कृति के प्रकाशन की सूचना भी देंवें ताकि हम इसका अवलोकन-पठन कर सकें ।

Dr. Braj Kishor ने कहा…

सिलसिला जारी रखें.